ब्रहास्त्र के बारे मे कुछ विषेश

ब्रह्मास्त्र एक पिरामिड है! जो एक्रेलिक धातु से बना होता है। इसमें हर व्यक्ति की रशिया राशियों के यंत्र, राशियों के तंत्र, राशियों का समान आदि विधिवत् तरीके से सजाकर रखा जाता है ताकि जब व्यक्ति इस ब्रह्मास्त्र को इस्तेमाल करे तो उसके जीवन में खुशहालियां आयें, घर के अन्दर शांति आये, घर की नकारात्मकता खत्म हो जाये, क्योंकि ब्रह्मास्त्र काॅस्मिक एनर्जी को अवषोशित करता है और सकारात्मकता फैलाता है। यह जिस घर के अन्दर रहता है, वहां सुख-शांति समृद्धि और धन की बरकत होती है। ब्रह्मास्त्र का निर्माण बेहद ही सावधानीपूर्वक और बेहद ही आध्यात्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत होकर किया जाता है, क्योंकि जरा-सी चूक आपको परेशानियों में डाल सकती है। हर राशि के जातकों के लिए अलग-अलग ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया जाता है। ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल राशियों के हिसाब से किया जाता है,

जैसे-
सूर्य ब्रम्हास्त्र:

सूर्य ग्रहों के मुखिया हैं और ये सिंह राशि के स्वामी हैं। यही कारण है कि सिंह राशि के जातकों को यह ब्रह्मास्त्र रखने से अत्यंत लाभ होता है। साथ ही साथ यह जानना जरूरी है कि सूर्य हैं कौन? यहां जान लें कि सूर्य का संबंध आपसे, आपके मान-सम्मान से, आपके कारोबार से, आपके व्यापार, आपकी नौकरी और आपके प्रमोसन से होता है। जिस व्यक्ति का सूर्य खराब होता है, उस व्यक्ति की सेहत कभी भी सही नही रहती है। सूर्य के खराब रहने की स्थिति में, व्यक्ति बी.पी, शुगर और औरतें गायनी आदि बीमारी से परेशान हो जाती हैं। यदि किसी जातक का सूर्य बेहद नीच का हो, तो उसे लकवा आदि बीमारी तक जकड़ लेती है, नतीजतन उस जातक का जीवन अपंगता की वजह से खराब हो सकता है। इसलिए जिन लोगों को ऐसी पेरशानियां आती हैं, उन्हें सूर्य के ब्रह्मास्त्र का ही इस्तेमाल करना फायदेमंद साबित होगा। सूर्य के ब्रह्मास्त्र को घर में रखने से व्यक्ति को बीमारियों एवं परेशानियों से मुक्ति मिलती है। यहां जैसा हम जानते हैं कि सूर्य सभी ग्रहों के राजा हैं। धर्मग्रन्थों में सूर्य देव को भगवान विष्णु का साक्षात रूप एवं संसार का वास्तविक पालनकर्ता कहा जाता है। सूर्य ही राशियों के स्वामी हैं और पृथ्वी सहित सभी ग्रह सूर्य देव के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। सूर्य पुरुष प्रधान और क्षत्रिय गुण से युक्त होते हैं। इनके देवता स्वयं भगवान विष्णु हैं और ये उग्र स्वभाव के हैं। इसलिए सूर्य देव को जब आप अपने घर में स्थान देते हैं, तो यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि स्थापना रविवार वाले दिन सुबह के समय पूर्व दिशा की ओर हो। यह बेहद ही शुभ माना जाता है। चूंकि पूर्व दिशा से आपको ताकत, बरकत और तरक्की मिलती है, इसलिए सूर्य ब्रह्मास्त्र को रविवार वाले दिन पूर्व दिशा में रविवार वाले दिन सुबह के समय यथावत् विधिपूर्वक स्थापित कर नियमित रूप से षांत भाव एवं प्रेमपूर्वक गायत्री मंत्र का उच्चारण करें। इसमें कोई संदेह नही है कि ऐसे करने से सूर्य ब्रह्मास्त्र आपके जीवन में खुशहाली , तरक्की और समृद्धि लायेगा। जय माता दी।

चन्द्र ब्रम्हास्त्र:

लघु परन्तु सबसे प्रभावषाली। मार्डन साईंस चन्द्रमा को ग्रह नहीं, बल्कि उपग्रह मानती है, परन्तु हमारी भारतीय ज्योतिश में इसे ग्रह की संज्ञा दी गई और अन्य नौ ग्रहों में इसकी गिनती की गई है। पृथ्वी के सबसे निकट या पास होने के कारण पृथ्वी और इसपर पर उपस्थित सभी जीवों पर चन्द्रमा का सबसे ज्यादा प्रभाव होता है। यह बहुत ही षीतल और सौम्य ग्रह है और इसी कारण स्वयं देवों के देव महादेव भगवान षंकर ने इन्हें अपने माथे पर षुषोभित, सम्मानित और स्थापित किया है। चन्द्रमा माँ से संबंध रखता है और माँ की कृपा होने पर किसी व्यक्ति के लिए इस संसार में कुछ भी असंभव नही है, वह अपने जीवन में वो सब कुछ पा लेता है जिसकी वह कामना करता है। चन्द्रमा मन, सौम्यता, षीतलता, संकोच, षालीनता, भावुकता, कल्पना, सौन्दर्य, लज्जा, प्रकृति और स्त्री आदि तत्वों का कारक होता है। जिस जातक का चन्द्रमा शुभ या उच्च होता है, वह अपने जीवन में बहुत तरक्की करता है। चन्द्रमा को ज्योतिश षास्त्र में मन का कारक माना गया है और यह बात हम अच्छी तरह जानते हैं कि हम जीवन में तभी आगे बढ़ते हैं जब हम किसी काम को मन लगाकर करते हैं। यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति किसी भी काम को मन लगाकर करता है, वो जितता ही है, इसमें कोई संदेह नही है। इसलिए जब चन्द्रमा शुभ होता है, तो व्यक्ति का मन भटकता नही और वह अपने काम को पूरे मन से करता है, जिसके कारण उसे सफलता मिलती है। परन्तु जब चन्द्रमा शुभ नही होता, अशुभ या नीच होता है, तब व्यक्ति का मन भटकता रहता है और वह किसी भी काम को एकाग्रता के साथ करने में असमर्थ होता है और कोई भी काम टिक कर नही कर सकता। नतीजन, निराषा और असफलता के सिवाय उसे कुछ प्राप्त नहीं होता। ऐसे परिस्थिति में चन्द्रमा के ब्रह्मास्त्र को घर में विधिवत् स्थापित करना बहुत ही शुभ दायक होता है। इसे सोमवार वाले दिन सुबह के समय उत्तर या पष्चिम दिषा में स्थापित करना उत्तम माना गया है। ऐसा करने पर घर में खुशहाली और बरकतें आती हैं। जय माता दी।

मंगल ब्रम्हास्त्र:

मंगल देव वृष्चिक और मेश राषि के स्वामी होते हैं। इसलिए वृष्चिक और मेश राषि के जातकों को मंगल ब्रह्मास्त्र जरूर रखने चाहिए। सामान्य कहावत के अनुसार मंगल या तो हर तरह से कुषल करता है या फिर मंगल केवल दंगल कराता है। धर्मग्रथों में मंगल को भूमिपूत्र यानि पृथ्वीपूत्र बोला गया है और ज्योतिश षास्त्र में इन्हे ग्रहों का सेनापति माना गया है। मंगल देव के अधिश्ठाता रामभक्त महावीर हनुमान हैं। अपने अधिश्ठाता हनुमान जी के समान ही मंगल देव भी वीर और योद्धा हैं। इनका रंग लाल और स्वभाव खूनी है। मंगल देव को इस वर्तमान युग का सबसे प्रभावषाली ग्रह माना जाता है, क्योंकि मंगल पराक्रम है। अगर आपके पास पराक्रम नही है, तो जीवन में कुछ भी हासिल कर पाना असंभव है। जिसके पास पराक्रम नहीं होता, दूनिया उसकी सुनती नहीं है। वहीं जो पराक्रमी होता है, दूनिया उसी के अनुसार चलती है। मंगल देव की शुभ ता या उच्च होने की स्थिति में, व्यक्ति पूलिस, सेना, खेल-कूद, फिल्म, माॅडलिंग, हथियार आदि से संबंधित क्षेत्रों में बहुत तरक्की करता है। मंगल देव का संबंध भाइयों और रिस्तेदारों से होता है। मंगल के अच्छा होने पर जातक हर प्रकार के सुख भोगता है। भाइयों और रिस्तेदारों के साथ उसका गजब का तालमेल ;न्दकमतेजंदकपदहद्ध होता है, और कभी भी इनके साथ संबंध खराब नही होते हैं। सभी इनके लिए जान देने को तैयार रहते हैं। परन्तु जब मंगल अशुभ या नीच का होता है, तो जातक का उसके रिस्तेदारों के साथ विवाद, लड़ाई-झगड़े आदि होते रहते हैं। प्राॅपट्री, धन आदि से संबंधित विवाद होने की पूरी-पूरी संभावना बनती है। कई बार मंगल के बद् होने पर व्यक्ति गलत रास्ते पर भी चल पड़ता है। यहां तक कि वह क्रिमिनल भी बन जाता है। इसकी वजह से जातक को कोर्ट-कचहरी, मुकदमेबाजी आदि परेषानियों का सामना करना पड़ता है और यहां तक कि जेल की हवा भी खानी पड़ जाती है। जब किसी जातक का मंगल बद् होता है, तो उसे खून, जीगर, लीवर, किडनी फेलियर आदि से संबंधित बीमारियां होने के पूरे-पूरे आसार होते हैं। ऐसे समय में, मंगल घर के अन्दर चोरी, डकैती या लूटपाट तक करवा सकता है। इसलिए यहां मंगल को शुभ रखने के लिए मंगल के ब्रह्मास्त्र को घर में स्थापित करना हर परेषानियों का हल होगा। मंगल के ब्रह्मास्त्र को मंगलवार वाले दिन दोपहर के समय घर के दक्षिण दिषा में स्थापित करना शुभ फल देता है। जय माता दी।

बुध ब्रम्हास्त्र:

बुध यानि काम षुद्ध। बुध ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल ज्यादातर मिथुन राषि और कन्या राषि के जातकों के लिए शुभ माना गया है। बुध देव ग्रहों के राजकुमार माने जाते हैं और आज के इस कलयुग में बुध के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति का बुध यदि षुद्ध नही हैं या खराब हैं, तो वह व्यक्ति इस कलयुग में कुछ नही कर सकता। चुंकि बुध देव वाणी और दिमाग के कारक हैं और आज के समय में यदि वाणि सही नहीं है, तो व्यक्ति वाणि से ही दोस्त बना लेता है और इसी वाणि से दुष्मन भी। इसलिए बुध देव का षुद्ध होना और शुभ होना किसी व्यक्ति के लिए अत्यंत अनिवार्य है। बुध देव के कारण सब कुछ मिल सकता है। आदमी जमीन से आसमान में पहुंच सकता है, क्योंकि बुध देव ग्रहों के राजकुमार हैं, और बुध देव की चालाकी एवं इनकी तेजी किसी भी व्यक्ति को फर्ष से अर्ष तक पहुंचाने के लिए काफी है। बुध देव बहन, बेटी, बुआ आदि से संबंध रखते हैं। साथ ही साथ बुध देव मीडिया, अभिनय, फैषन डिजाईनिंग, इण्टेरियर डिजाईनिंग, गायकी, नृत्य या कला के अन्य क्षेत्र आदि के कारक हैं। इसलिए व्यक्ति यदि ऐसे किसी क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, तो बुध का ब्रह्मास्त्र उसके जीवन में चार चाँद लगा सकता है। बुध के अशुभ ता या खराबी के कारण दिमागी बीमारियां, डिप्रेषन, जबानी बीमारियां, तुतलाहट, हकलाहट आदि परेषानियां हो सकती है। बुध देव नर्वस सिस्टम ;छमतअवने ैलेजमउद्ध के मालिक हैं, इसलिए नर्वस सिस्टम भी प्रभावित हो सकता है। यदि किसी को इस तरह की परेषानियां आती हैं, तो यहां बुध के ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह आपके जीवन में सुख-षांति देगा। बुध ग्रह के देवता माताष्वेरी दूर्गा हैं। इसलिए बुध को षुद्ध करने के लिए या इनकी कृपा पाने के लिए आप माँ दूर्गा की पूजा अर्चना भी कर सकते है। बुध देव पृथ्वी और वायु दोनों तत्वों से परिपूर्ण हैं। साथ ही साथ इनमें स्त्री एवं पुरूश (नपूंसकता) के तत्व भी होते हैं। बुध कभी बूढ़ा नही होता। बुध की जवानी एवं रंगीनियां सदा बनी रहती है। जिस व्यक्ति का बुध षुद्ध होता है, वह चतुर और हास्य प्रधान होता है और अपनी बातों से पूरी दूनिया को प्रभावित कर अपने साथ लेकर चलता है। इनका रंग हरा है और इनकी दिषा उत्तर मानी गई है। इसीलिए बुध के ब्रह्मास्त्र को हमेषा उत्तर दिषा में ही स्थापित करना चाहिए और बुध देव से अपने जीवन में खुषहानी मांगनी चाहिए। बुध देव वाणि, भाशण, लेखा-जोखा, ऐष्वर्य, ज्योतिश, बुद्धि, खोज, जासूसी और नेतागिरी का प्रतिक है। इसलिए आज के इस कलयुग में बुध देव को नजरअंदाज करना परेषानियों को निमंत्रण देना है, क्योंकि अगर बुध खराब हुआ, तो दिमाग खराब होगा। गंदहीनता की बीमारी आ जायेगी, दांत खराब हो जायेंगे। इसलिए बुध देव को नमस्कार करते हैं और अपने घर बुलाकर उनका आह्नान करते हैं। जय माता दी।

गुरु ब्रम्हास्त्र:

गुरु यानि बृहस्पति धनु और मीन राषि के स्वामी हैं। इसलिए धनु और मीन राषि के जातकों को गुरु यानि बृहस्पति का ब्रह्मास्त्र अपने घर में रखना बहुत ही शुभ होता है। बृहस्पति गुरु से संबंध रखते हैं और आज के इस युग में विद्या, प्रोफेषनल कोर्सेज, ज्ञान, हुनर इन सब का बहुत महत्व है। क्योंकि यदि किसी व्यक्ति के पास हुनर नहीं है, तो वह जीवन में नाकाम हो जाता है और उसे इस समाज में बिल्कुल नकार दिया जाता है। तो ऐसे समय पर गुरु यानि बृहस्पति का ब्रह्मास्त्र आपके ज्ञान, विद्या, प्रोफेषनल कोर्सेज, परिक्षाओं, प्रतियोगिताओं आदि में आपके लिए बहुत-बहुत लाभकारी होगा। गुरु यानि बृहस्पति के ब्रह्मास्त्र को स्थापित करने से घर में खुशहाली , पारिवारिक जीवन में आनंद एवं सुख-षांति बनी रहती है। क्योंकि जिस घर में गुरु की कृपा नही है, उस घर में कुछ भी संभव नही होता है। वहीं जिस घर में गुरु की कृपा हो जाये, वहां केवल और केवल खुशहाली ही खुषहानी होती है। ‘गुरु’ संस्कृत के दो अक्षरों ‘गु’ $ ‘रु’ से मिलकर बना हुआ एक वृहत षब्द है। जिसमें ‘गु’ का अर्थ - अँधेरा से और ‘रु’ का अर्थ - उजाला से है। ‘गुरु’ षब्द हमारे जीवन में बहुत मायने रखता है। जो हमें अँधेरे से उजाले की ओर ले जाते हैं, वे गुरु ही हैं। बृहस्पति को देवताओं का गुरु कहा जाता है। ये विद्या और षक्ति के अधिश्ठात्रा हैं। गुरु यानि बृहस्पति के प्रकोप से ही या यूँ कहें कि गुरु यानि बृहस्पति के नीच या खराब होने से ही सांसों, फेफड़ों, गले आदि से संबंधित बीमारियां किसी के जीवन में आती हैं। इसलिए गुरु को घर में स्थान देना चाहिए और गुरु यानि बृहस्पति के ब्रह्मास्त्र को बृहस्पति वाले दिन अपने घर में विधिवत् स्थापित करना चाहिए। इन्हें स्थापित करने का सबसे उत्तम समय प्रातः 7 बजे से पहले का माना गया है। जय माता दी।

शुक्र ब्रम्हास्त्र:

शुक्र देव वृश और तुला राषि के स्वामी हैं। आज के इस कलयुग में शुक्र के बिना कुछ भी नही है, क्योंकि शुक्र पारिवारिक जीवन है। यह धन है और जीवन की लग्जरी ;स्नगनतलद्ध है। शुक्र देव का संबंध पत्नी, धन और लग्जरी ;स्नगनतलद्ध से होता है, इसलिए जीवन में शुक्र देव को षुद्ध करना और उच्च करना बहुत ही अनिवार्य है। शुक्र देव की अधिश्ठात्री माँ लक्ष्मी हैं और आज के समय में बिना लक्ष्मी के कोई काम संभव नही है। शुक्र देव का स्वभाव रसीक और कलात्मक है, जिस कारण शुक्र देव के उच्च होने से जातक अभिनय, मीडिया, संगीत, गायकी, नृत्य, फैषन डिजाईनिंग, माॅडलिंग, ब्यूटी पार्लर, बुटिक आदि से संबंधित कार्यों में बहुत तरक्की करता है। शुक्र देव की शुभ ता होने से व्यक्ति बहुत बड़े डाॅक्टर, षल्य चिकित्सक आदि भी बन जाते हैं और समाज में ऐसे काम कर जाते हैं कि दूनिया हमेषा उन्हे याद रखती है। लेकिन यदि शुक्र देव नीच के या अशुभ हुए, तो व्यक्ति को दांतों, नाड़ियांे, जबान और स्कीन से संबंधित प्राॅब्लम्स ;च्तवइसमउेद्ध हो सकती है। जिस कारण व्यक्ति परेषान हो सकता है। इसलिए शुक्र के ब्रह्मास्त्र को हमें अपने घर में स्थापित करना चाहिए। ऐसे करने से शुक्र देव प्रसन्न होंगे और हर तरह से बरकते और आर्षिवाद देंगे। शुक्र देव का रंग सफेद है और इनकी दिषा दक्षिण-पूर्व मानी जाती है। इसलिए हमें शुक्र के ब्रह्मास्त्र को दक्षिण-पूर्व दिषा में ही स्थापित करना चाहिए और उनसे जीवन में शुभ ता मांगनी चाहिए।

शनि ब्रम्हास्त्र:

शनि मकर और कुंभ राषियों के स्वामी हैं। इसलिए इन राषियों के जातकों को शनि का ब्रह्मास्त्र रखना शुभ होता है। शनि देव बाहर से तो बहुत कठोर, लेकिन अन्दर से बहुत ही सौम्य और मृदुल हैं। शनि एक विषालकाय, चमकदार एवं दर्जनों उपग्रहों से युक्त आकाषगंगा के एक सुन्दर ग्रह हैं। वहीं ज्योतिश षास्त्र में इनका वर्णन एक क्रूर और पापी ग्रह के रूप में किया गया है। यह एक गंभीर और दुश्ट स्वाभाव के ग्रह हैं। इनमें स्त्री और पुरुश (नपुंसक) दोनों के ही गुण होते हैं। इनका रंग काला है और ये पृथ्वी एवं वायु तत्वों से युक्त हैं। आज के इस कलयुग में शनि देव को बहुत महत्व दिया गया है। शनि देव की कृपा किसी को रंक से राजा बना देती है, तो वहीं इनका कोप किसी राजा को रंक बनाकर भीख तक मँगवा देती है। शनि देव एक ही क्षण में मानव को खुषियों एवं खुसहालियों का तोहफा दे सकते हैं, तो दूसरे ही क्षण वे मानव जीवन को तबाह और बर्बाद करने में भी सक्षम हैं। शनि देव की गति (चाल) बहुत धीमी है, यही कारण है कि उन्हें ‘ऊँ षनेः षनेः षनेष्चराय नमः’ से संबोधित ;त्मचतमेमदजद्ध किया जाता है। शनि देव की शुभ ता या उच्च होने की स्थिति में एक साधारण व्यक्ति प्राॅपट्री, जमीन-जायदाद, पेट्रोल पंप का मालिक, तेल, दवाईंयों, पत्थरों का काम आदि से संबंधित क्षेत्रों में तरक्की कर बहुत बड़ा आदमी बन जाता है। परन्तु अगर शनि शुभ नही हैं या नीच के हैं, तो व्यक्ति रोटी तक के लिए मोहताज हो सकता है। शनि देव को नाराज या कुपित करना बीमारियों एवं परेषानियों को न्योता देना है। शनि आँखें खराब करता है, दिल और दिमाग दोनों की बीमारियां देता है। शनि के वजह से ही स्पाईन प्राॅब्लम ;ैचपदम च्तवइसमउेद्ध, डिस्क प्राॅब्लम ;क्पेा च्तवइसमउेद्ध, हड्डियों से जुड़ी परेषानियां ;ठवदमे क्पेमंेमेद्ध, कमर में दर्द, घुटनों और जोड़ों में दर्द ;श्रवपदजे च्ंपदद्ध, आदि बीमारियाँ होती हैं। इसलिए शनि देव को अपने जीवन में हमेषा शुभ रखें और उनकी कृपा पाने की यथा संभव कोषिष करें। शनि देव की शुभ ता और कृपा पाने का सबसे सरल और उत्तम उपाय है- शनि ब्रह्मास्त्र को स्थापित करना। शनि ब्रह्मास्त्र को घर में स्थान देने के लिए शनि वार का दिन सबसे उपयुक्त माना जाता है। शनि ब्रह्मास्त्र को आप अपने घर में दक्षिण-पष्चिम दिषा में सुबह या षाम किसी भी समय स्थापित कर सकते हैं। ऐसा करने से शनि देव की कृपा और शुभ ता आपके घर-परिवार पर बनी रहेंगी और आपके घर में खुषहालियाँ आयेंगी।

राहु ब्रम्हास्त्र:

राहु मानव के जीवन में अचानक होनेवाली घटनाओं के कारक हैं। दिन में सूर्य और रात में चन्द्रमा को तो सभी सरलता से देख पाते हैं साथ ही साथ दूसरे पाँच ग्रह भी आकाष में कभी न कभी स्पश्ट रूप से देखे जा सकते हैं। परन्तु राहु और केतु छाया ग्रह हैं जो स्थूल रूप में दिखाई नही देते। ज्योतिश विद्या में राहु को निर्धनों का सहायक और यमराज का दरबार कहा गया है। राहु पल में राजा और पल में फकीर बनाने की ताकत रखते हैं। राहु हठ, दुश्टता, स्थिरता, कुटनीतिज्ञता, वाचलता, आलस्य, दरिर्दता, रूकावट, राजनीति, बाधा, झूठ, मक्कारी आदि के कारक हैं। जिस व्यक्ति का राहु शुभ होता है या यूँ कहें कि जिस व्यक्ति पर राहु अपनी कृपा कर दे, उसे दुनिया के सर्वस्य सुख अपने आप मिल जाते हैं। राजनीति में उच्च सफलता, कूटनीति, षत्रुओं के दमन और दुष्मनों का नाष करने आदि में राहु की शुभ ता ही सबसे अहम भूमिका निभाती है। परन्तु राहु जब अशुभ या नीच के होते हैं तो व्यक्ति का सबकुछ बर्बाद हो जाता है। इनके कारण ही अचानक से होने वाली दुघर्टना या बीमारी की वजह से घर में किसी की मृत्यु संभव होती है। इसलिए राहु को शुभ रखना और उनकी कृपा पाना व्यक्ति के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि अगर राहु शुभ नही हैं, तो आपके जीवन में कुछ भी शुभ नहीं हो सकता। राहु का संबंध व्यक्ति के ननिहाल से होता है। यही कारण है कि उच्च राहु वाले व्यक्ति का अपने मामा, मामी, नाना, नानी आदि के साथ बहुत सुन्दर संबंध होते है और उसे अपने ननिहाल से धन भी प्राप्त होता है। अगर राहु शुभ नही हैं, तो ननिहाल से नाराजगी हो जाती है। व्यक्ति ननिहाल के ऋण से परेषान हो जाता है। जब राहु नीच के होत हैं, तो व्यक्ति ठगी, चोरी, डकैटी, आगजनी, बिजली आदि से संबंधित दुर्घटनाओं से परेषान रहता है। वह अय्यास, षातिर, बदमाष होने के कारण जेल तक के दरवाजे देखकर आ जाता है। राहु की नीचता में, षत्रु व्यक्ति को बर्बाद कर देता है। उसके आस-पास के और उसके नीचे काम करने वाले लोग भी उसके विरोधी हो जाते हैं। व्यक्ति का सब कुछ खत्म हो जाता है। इसलिए राहु की नीचता कभी भी मत होने दें, क्योंकि जब राहु उच्च होंगे तो व्यक्ति हर बुराई, षत्रुता, बला और छल को एक फूंक में ठीक करने वाला हो जाता है। ऐसे में, राहु की प्रसन्नता और उनकी उच्चता के लिए राहु के ब्रह्मास्त्र को घर में स्थापित करना बहुत अनिवार्य हो जाता है। ऐसे मे राहू को बल देने हेतू यहाॅं राहु के ब्रह्मास्त्र को आप गुरुवार वाले दिन षाम के समय स्थापित कर सकते हैं। इस ब्रह्मास्त्र के साथ आप माँ सरस्वती की एक प्रतिमा भी रख सकते हैं, जो राहु देव की शुभ ता को और ज्यादा प्रभावी बना देता है। ऐसा करने से राहु देव आप और आपके पूरे घर-परिवार पर अपनी कृपा बरसायेंगे। जय माता दी।

केतु ब्रम्हास्त्र:

केतु को नेकी का फरिस्ता और सबके सहायक के नाम से जाना जाता है, क्योंकि वे सच्च में सबके मददगार होते हैं। केतु भी एक छाया ग्रह है। आकाषगंगा में हम केतु को कभी भी देख नही पाते हैं। छाया ग्रह होने के बावजूद भी केतु मानव जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। केतु के कई गुण मंगल के समान है। इनका रंग धुंधला मटमैला है। जब केतु शुभ ता या उच्च की स्थिति में होते हैं, तो व्यक्ति गुप्त प्रवृति का और चालाक होता है। व्यक्ति गुप्तचर विभाग में, षराब, गोला-बारूद, विश, तेजधार वाले षस्त्र, सफल वक्ता आदि क्षेत्रों में बहुत तरक्की करता है। केतु की शुभ ता में व्यक्ति एक बेहतरीन डाॅक्टर, सर्जन, षल्यचिकित्सक आदि होकर बहुत नाम कमाता है। उच्च केतु वाले व्यक्ति बहुत अच्छे अध्यापक और प्रोफेसर भी साबित होते है। इसलिए केतु की भूमिका आज के समय में बहुत महत्वपूर्ण है। केतु मोक्ष का द्वार भी हैं। अगर व्यक्ति को परमधाम को प्राप्त करना है, तो केतु की शुभ ता उसके लिए बहुत अनिवार्य है। यहां केतु पुत्र से संबंधित होता है। औलाद का सुख ना होना, औलाद का भटक जाना, औलाद का अपने माता-पिता से विरोध और उनका कहना ना मानना, औलाद का हो-होकर मर जाना आदि यह सब केतु की अशुभ ता के कारण होता है। केतु की अशुभ ता में ही संतानें वंष का विनाष करती हैं। संतान होती ही नही हैं और व्यक्ति संतान के लिए दुनियाभर में दर-दर भटकता रहता है। यदि केतु शुभ हैं, तो संतान कुल का नाम रोषन करती हैं और कुल को आगे लेकर जाती है। इसलिए केतु को शुभ करके हम संतान सुख पा सकते हैं। केतु हड्डी, पैर और दिमाग से भी संबंध रखते हैं। यही वजह है कि केतु के नीच होने की स्थिति में हड्डियों का कैंसर हो जाता है

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