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आदि गुरु शंकराचार्य- एक अद्भुत प्रतिभा के धनी

Blog, 04/05/2024

शंकराचार्य भगवान शिव के अवतार माने जाते हैं।  शंकराचार्य को जगद्गुरु के रूप में मान्यता प्राप्त है। हिंदू धर्म में शंकराचार्य की उपाधि सर्वोच्च मानी जाती है, जो किसी व्यक्ति द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि साक्षात भगवान द्वारा स्थापित है। 'शंकराचार्य' वो उपाधि है, जो हर युग में एक ऋषि को मिलती है।

 

कौन थे आदि गुरु शंकराचार्य ?

आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म ब्राह्मण कुल में आठवीं सदी में केरल के कालड़ी गांव में वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष पंचमी को हुआ था। मान्यता है कि स्वंय भगवान शिव ने शंकराचार्य के रूप में जन्म लिया था। शंकराचार्य बहुत ही छोटी उम्र में संन्यासी बन गए थे। शंकराचार्य का निधन सिर्फ 32 साल में हो गया था।

 

अत्यंत महान और विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति 

आदि शंकराचार्य जी अत्यंत महान और विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति थे। उनकी बुद्धिमत्ता की बात करें तो वह आध्यात्मिक प्रकाश के अद्भुत स्रोत और हमारे गौरव थे। जब वह छोटे भी थे तब से ही वह बहुत ही विद्वान थे। छोटी सी उम्र में उनका ज्ञान सबको हैरान कर देता था। उनकी विद्वता अत्यंत विलक्षण थी। भाषाओं में तो वह असामान्य विद्वान थे। उनकी प्रतिभा सबसे अलग और दिव्यता से भरी थी। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि वे एक आध्यात्मिक प्रकाश स्तंभ थे और भारत के गौरव भी।

 

छोटी सी उम्र में भी बुद्धिमानी और ज्ञान का भंडार थे वह

एक सामान्य इंसान से शंकराचार्य जी की बुद्धि और ज्ञान का जो स्तर था वह बहुत ही अधिक था। वो ज्ञान के स्रोत थे और ज्ञान जैसे उनमें कूट-कूट कर भरा था। पारस परिवार के मुखिया महंत श्री पारस भाई जी बताते हैं कि उनकी योग्यताएं सामान्य लोगों से अलग थी। सिर्फ दो वर्ष की आयु में वह पूरे प्रवाह के साथ संस्कृत बोलने के साथ-साथ लिख भी सकते थे। चार साल की छोटी सी उम्र में वो वेदों का पाठ कर सकते थे और आप यह जानकर हैरान होंगे कि मात्र 12 की उम्र में उन्होंने संन्यास लेकर घर भी छोड़ दिया था।  शंकराचार्य का निधन सिर्फ 32 साल में हो गया था। इतनी कम उम्र में उन्होंने लोगों को हिंदू धर्म का ज्ञान दिया था। 12 से 32 वर्ष की छोटी सी उम्र में शंकराचार्य जी ने भारत की कई यात्रायें की और इस छोटी सी उम्र में उन्होंने हज़ारों पृष्ठों  के साहित्य की रचना भी की।

 

शंकराचार्य ने हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना की

हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना का श्रेय आदि गुरु शंकराचार्य को दिया जाता है। शंकराचार्य ने लोगों को हिंदू धर्म के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि आखिर हिंदू धर्म क्या है। शंकराचार्य ने हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार किया। शंकराचार्य जी ने लोगों के बीच हिंदू धर्म को लेकर जितनी भी भ्रांतियां थी वो सब मिटाई। क्योंकि हिंदू धर्म को लेकर लोगों ने तरह तरह की बातें फैलाई थी। कई लोगों ने वेदों का गलत मतलब बताया जिस वजह से लोगों ने गलत प्रथा को अपनाया। इन सभी चीज़ों को उन्होंने सही किया। अपने छोटे से जीवन में वे इस देश की लंबाई चौड़ाई कई बार नाप चुके थे। आदि शंकराचार्य को गुरु गौड़पाद से मार्गदर्शन मिला और उनके मार्गदर्शन से ही यह सब असंभव कार्य आदि शंकराचार्य ने किये।

 

शंकराचार्य ने की मठों की स्थापना

हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना की। ये चार मठ उन्होंने चार कोनों में स्थापित किए। उन्होंने उत्तर दिशा में बद्रिकाश्रम में ज्योर्तिमठ, पश्‍चिम दिशा में द्वारिका में शारदा मठ, दक्षिण दिशा में श्रंगेरी मठ और पूर्व दिशा में जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन मठ की स्थापना की। शंकराचार्य का पद हिंदू धर्म में सबसे बड़ा पद है। शंकराचार्य ने इन मठों की स्थापना के बाद अपने शिष्यों को इन मठों की जिम्मेदारी दी।

 

शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत

शंकराचार्य के वेदांत को अद्वैत वेदांत कहा जाता है। शंकराचार्य जी कहते थे कि इस संसार में ब्रह्म ही सत्य है। सभी चीज़ें ब्रह्म से जुड़ी हैं। शंकराचार्य ने दुनिया को माया का क्या रहस्य है वो भी समझाया था।

 

शंकराचार्य के बाद से ही देश में शंकराचार्य की परंपरा की शुरुआत हुई ?

शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना की थी और उन सभी मठों में अपने शिष्यों को आसीन किया था जिससे उनके वे सभी शिष्य शंकराचार्य कहलाए। तब से लेकर अभी तक मठों में शंकराचार्य की परंपरा आज तक चलती आ रही है। ये हिंदू धर्म में सबसे सम्मानदायक और सर्वोच्च पद माना जाता है।

 

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