हिंदू धर्म में मेष संक्रांति का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी दिन एक महीने के खरमास की समाप्ति होती है और मांगलिक कार्य पुन: शुरू हो जाते हैं। इस दिन सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के राशि परिवर्तन को संक्रांति कहा जाता है। मेष संक्रांति से मांगलिक विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि शुरू हो जाते हैं। इसके बाद नए काम की शुरुआत कर सकते हैं। मेष संक्रांति को भारत के कई राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। पंजाब में बैसाखी, आसाम में बोहाग बिहू, बिहार में सतुआनी, तमिलनाडु में पुथांदु, पश्चिम बंगाल में पोइला बैसाख, ओडिशा में पना संक्रांति के नाम से जाना जाता है।
पंचांग के अनुसार जब सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करते हैं उस दिन हिंदू नववर्ष की पहली संक्रांति मनाई जाती है। इसे मेष संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महंत श्री पारस भाई जी ने बताया कि इस दिन तीर्थ स्नान करने से महापाप भी धुल जाते हैं। इस संक्रांति को दान, तिल द्वारा पितरों का तर्पण आदि किया जाता है।